जयपुर में पतंगबाज़ी

मैं जयपुर का रहने वाला 21 साल का नौजवान हूँ। हमारे जयपुर में 14 जनवरी (मकर संक्रान्ति ) के दिन पतंगें उड़ती हैं। हम लोग पूरी जनवरी महीने में छत पर ही रहते और पतंगें उड़ाते थे।
हम पतंग उड़ाते हुए बहुत मजे करते थे। मैं इस बार अपने दोस्त तरुण के घर की छत से ही पतंगे उड़ा रहा था। उसका घर मेरे घर से एक किलोमीटर दूर है। तरुण के छत के पीछे वाली छत पर रोज़ एक खूबसूरत लड़की आती थी।
मैंने तरुण से उसका नाम पूछा तो बोला- इसका नाम रक्षिता है।
और साथ में यह भी बताया कि यह किसी को लाइन नहीं देती है।
मैंने कहा- मैं इस खूबसूरत रक्षिता से दोस्ती करना चाहता हूँ !
तो वो बोला- तू पागल तो नहीं हो गया ? जिस लड़की ने आज तक हमसे दोस्ती नहीं की, वो तुझ से क्या करेगी?
मैं बोला- चल लगी हज़ार की शर्त ! मैं इससे दोस्ती करके रहूँगा।
वो बोला- ठीक है…
अब आप लोगों को उसका आकर्षक फिगर बताता हूँ… उसके वक्ष का आकार 36 और शक्ल मानो करीना सामने आ गई हो…
मैं उसके नाम पर रोज़ मुठ मारता था।
बात 11 जनवरी 2009 की है, उस दिन में पतंग उड़ा रहा था। किस्मत से उस दिन हवा भी रक्षिता के घर की तरफ थी। मैंने देखा कि वो कपड़े सुखाने छत पर आई है तो मुझे एक आईडिया आया और मैंने उसके छत पर रखे गमलों में अपनी पतंग अटका दी।
और आवाज लगाई- मैडम, मेरी पतंग सुलझा दो…
उसने पहले तो मेरी तरफ गुस्से से देखा फिर पतंग हटाती हुई बोली- मिस्टर, मेरा नाम रक्षिता है !
मैं बोला- अच्छा नाम है ! और मेरा नाम रोहित है…. और मैंने यह पतंग जानबूझ कर अटकाई थी क्योंकि मुझे आपसे दोस्ती करनी है…
फिर वो गुस्से भरे लाल चेहरे से बोली- तुमने सिर्फ दोस्ती करने के लिए मुझे परेशान किया? दोस्ती के बारे में सोच कर बताउँगी।
मैं बोला- ठीक है…..
अगले दिन में छत पर उसका इन्तज़ार कर रहा था, करीब दो बजे छत पर आई। तब मैं अकेला ही छत पर था।
वो आकर बोली- मुझे लगता है कि तुम एक अच्छे इन्सान हो क्योंकि तुमने उसी समय सच्चाई बता दी… इसलिए मैंने निर्णय लिया है कि मुझे तुमसे दोस्ती करना मंजूर है..
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मैं ख़ुशी से उछल पड़ा …फिर मैंने उससे उसका फ़ोन नंबर लिया…
बाद में मैंने तरुण से पूछा- रक्षिता के घर में कौन कौन है?
वो बोला- यह अपने भाई और भाभी के साथ रहती है।
मुझे लगा कि मुझे इसके भाई से दोस्ती करनी चाहिए जिससे रक्षिता के घर में घुस सकूँ !
मैं तरुण से बोला- यार, मुझे रक्षिता के भाई से मिला दे…
तरुण बोला- मिला तो दूंगा, पर आगे बात तुझे ही संभालनी पड़ेगी..
मैंने कहा- ठीक है।
शाम को जब उसका भाई आया तो तरुण ने उससे मुझे मिलवाया …
अगले दिन 13 जनवरी थी तो मैंने रक्षिता के भाई से पूछा- कल मैं आपके साथ आपकी छत पर पतंग उड़ा सकता हूँ?
तो बोले- हाँ क्यों नहीं ! मुझे भी कोई साथी मिल जाएगा..
अगले दिन हम दोनों 9 बजे छत पर पतंग उड़ाने चले गए…
हमने 2-3 पतंगें उड़ाई, तब रक्षिता हमारे लिए कुछ खाने के लिए ले आई…
जब वो आई, तब उसका भाई पतंग उड़ा रहा था, उसका ध्यान हमारी तरफ नहीं था।
मैंने उसे आँख मार दी और उसने मुस्कान दिखाई…
अब तो मैं उसी चोदने के बारे में सोचने लगा…
फिर वो नीचे चली गई।
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